दिखता नहीं है कुछ भी यहाँ, कोई क्या करे: Saleem KHAN


दिखता नहीं है कुछ भी यहाँ, कोई क्या करे
होता नहीं है कुछ भी यहाँ, कोई क्या करे.
टूटा जो सुनहरा सपना, कोई क्या करे
दूर हो गया अपना, कोई क्या करे.

जीस्त सूनी-सूनी थी हर सू जब
दिल में आया नहीं था कोई भी तब
आया वो दुनियाँ में मेरे खुशियाँ लेके
क्यूँ छोड़ गया मुझे तन्हा, कोई क्या करे.

वादे पे वादे किये थे उसने मगर
दिल में इरादे किये थे उसने मगर
क़समें भी खाईं साथ रहने की उम्र भर
क़समें तोड़ के गया चला, कोई क्या करे.

3 टिप्पणियाँ:

हल्की-फ़ुल्की सी तक़रार करो



जब किसी से कभी भी प्यार करो
अपने दिल का तो इज़हार करो
जब किसी से कभी भी....

वक़्त रहता नहीं कभी यकसाँ 
मौक़ा मिलते उनका दीदार करो
जब किसी से कभी भी....

लौट आएगा पुराना वो शमाँ
दिल से ऐसी कुछ पुकार करो
जब किसी से कभी भी....

छुप गया है बादलों में कोई
ऐसे तारे का बस इन्तिज़ार करो
जब किसी से कभी भी....

जब कभी भी किसी से प्यार करो
हल्की-फ़ुल्की सी तक़रार करो
जब किसी से कभी भी....

4 टिप्पणियाँ:

दुआएं तेरी क्यूँ हो गयीं बेअसर...: Saleem Khan


मंज़िले-जाविदाँ की पा सका न डगर
पूरा होके भी पूरा हो सका न सफ़र

दुआएं तो तुने भी की थी मेरे लिए
दुआएं तेरी भी क्यूँ हो गयीं बेअसर

मुश्किल कुछ भी नहीं इस जहाँ में
साथ तेरा जो मिल जाए मुझे अगर

दिखा जब से मुझे सिर्फ तेरा ही दर
तब से ही भटक रहा हूँ मैं दर ब दर

जब तू समा ही गयी है मेरी नज़र में 
तो अब क्यूँ नहीं आ रही है मुझे नज़र

3 टिप्पणियाँ:

क्या मैं हूँ कमज़ोर या फिर हूँ ताक़तवर: Saleem Khan


क्या मैं हूँ कमज़ोर या फिर हूँ ताक़तवर
क्यूँ फूंक के बैठा हूँ खुद मैं अपना घर

ग़म ज़ेहन में पसरा है तारिक़ी का पहरा है
न रास्ते का है पता अब मैं जाऊं किस डगर

आरज़ू मेरे दिल की क्यूँ तमाम हो गयी
ज़िन्दगी जाएगी किधर नहीं है कुछ ख़बर

अक्स मेरा अब खुद हो गया खिलाफ़ मेरे
चेहरा मेरा खुद क्यूँ नहीं आता है नज़र


तेरा ही सहारा है ऐ खुदा, कर दे मदद
मेरी तरफ़ भी तू कर दे रहम की नज़र

2 टिप्पणियाँ:

अहले वफ़ा के शहर में क्या हादसा मिला: Saleem Khan

अहले वफ़ा के शहर में क्या हादसा मिला
मुझसे जो शख्स मिला सिर्फ़ बेवफ़ा मिला

मैंने ज़िन्दगी भर उसे अपना हबीब ही समझा
उसको ये क्या हुआ कि वो रक़ीबों से जा मिला

उम्र भर जिसके साथ रहे मोहब्बत की राह में
उसी का पता ज़िन्दगी भर मैं पूछता मिला

दोस्त बन बन के मुझे दर्द देते रहे सभी
अपनों के बीच कुछ ऐसा सिलसिला मिला

0 टिप्पणियाँ:

मुझको दीवाना समझ वो मुस्कुराते रहे !


हम नशेमन बनाते रहे और वो बिजलियाँ गिराते रहे
अपनी-अपनी फितरत दोनों ज़िन्दगी भर निभाते रहे

समझ न सके वो हमें या हम ही नादान थे
उसूल-ए-राह-ए-इश्क वो मुझे समझाते रहे!

कहा जो मैंने गर कहो तो जाँ दे दूं "आरज़ू"
मुझको दीवाना समझ वो मुस्कुराते रहे !


शिकायत रहेगी हमेशा ता-क़यामत मुझे 
साथ रकीब के वो मेरी क़ब्र पर आते रहे!

12 टिप्पणियाँ:

तुम क्या जानों मुहब्बत क्या है: Saleem Khan

हवस की ज़ेहनियत रखने वालों
तुम क्या जानों मुहब्बत क्या है

अपने चेहरे पे नक़ाब रखने वालों
तुम क्या जानों मुहब्बत क्या है

इश्क़ की दुनिया आबाद करके
फ़िर किसी को वीरानगी देने वालों
तुम क्या जानों मुहब्बत क्या है

एक वक़्त आएगा ऐसा जब
तड़पोगे तुम भी किसी के लिए
तब जानोगे कि मुहब्बत क्या है

1 टिप्पणियाँ:

अलग रहने के बना लिए बहाने...Saleem Khan


दूर जाके मुझसे बना लिए ठिकाने

अलग रहने के बना लिए बहाने

बिछड़ के तुमने बहुत अश्क़ हैं दिए
उन्हीं अश्क़ से हमने बना लिए फ़साने

दौलत पे अपने तुम्हें रश्क है बहुत
हमने मुफ़लिसी को बना लिए ख़जाने

शहनाई बज उठी जब लाश पे 'सलीम'
मैंने उन्ही से अब अपने बना लिए तराने

महलों में रहने वाली तुम खुश रहो सदा
हमने तो खंडहर में अब बना लिए ठिकाने

0 टिप्पणियाँ:

हसीनों की ख़ासियत... Saleem Khan


किसी के दिल को आबाद करके
फिर उसे तोड़ कर बर्बाद करना

किसी के बेजान दिल में जान भर कर 
फिर उसे बेईम्तहा बेजान कर देना

किसी तन्हा को पास बुला कर
फिर उसे तन्हा होने की सज़ा देना

किसी की आँखों को ख़्वाब दिखा कर
फिर अश्क के मझधार में छोड़ देना

किसी की रातों को उजाले में तब्दील करके
फिर उसे उम्र भर अँधेरे में धकेल देना

हसीनों की ख़ासियत बन गयी है.

2 टिप्पणियाँ:

मेरे मन के उजाले पास में आ, आ देख ले कितना अँधेरा है::: Saleem Khan



मेरे मन के उजाले पास में आ 
आ देख ले कितना अँधेरा है

रातें ही रातें क़िस्मत हैं
और दूर कितना सवेरा है

आबाद ज़माना क्या जाने
मेरे मन में किसका बसेरा है

गर्दिश के जंज़ीरो में घिरकर
नहीं उठता क़दम अब मेरा है

कोई दूसरा उसका बलम भी है
ये देख के रोता दिल मेरा है


1 टिप्पणियाँ:

आशियाना मुझे एक मयस्सर न हो सका: ऐ खुदा तुने ये जहाँ किस तरह बनाया है !


ये कैसा हादसा हमें पेश आया हैं
सिर पे सलीब रोज़ हमने उठाया है

जब चिराग़-ओ-शम्स मयस्सर न हुआ
अपने दिल को रौशनी के लिए जलाया हैं

आशियाना मुझे एक मयस्सर न हो सका
ऐ खुदा तुने ये जहाँ किस तरह बनाया है

मैं क्या करूँगा ज़माने की ख्वाहिशें
जबसे तुने मुझको रोना सिखाया है 
  
तेरे ही बदौलत सही मुझे ये नसीब है
सरे-ज़माना मैंने अब सर कटाया है
  
किस्मत की दास्ताँ कुछ इस तरह हुई
ग़म-ख्वार ने ही 'सलीम' हर ग़म बढाया है

5 टिप्पणियाँ:

Blogger Template by Clairvo