अल्लाह रसूल का फ़रमान इश्क़ है, याने हदीस इश्क़ है, कुरआन इश्क़ है! A greatest Film Song


ना तो कारवाँ की तलाश है, ना तो हमसफ़र की तलाश है
मेरे शौक़-ए-खाना खराब को, तेरी रहगुज़र की तलाश है

मेरे नामुराद जुनून का है इलाज कोई तो मौत है
जो दवा के नाम पे ज़हर दे उसी चारागर की तलाश है

तेरा इश्क़ है मेरी आरज़ू, तेरा इश्क़ है मेरी आबरू
दिल इश्क़ जिस्म इश्क़ है और जान इश्क़ है
ईमान की जो पूछो तो ईमान इश्क़ है
तेरा इश्क़ है मेरी आरज़ू, तेरा इश्क़ है मेरी आबरू,
तेरा इश्क़ मैं कैसे छोड़ दूँ, मेरी उम्र भर की तलाश है

ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़,ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़

जाँसोज़ की हालत को जाँसोज़ ही समझेगा
मैं शमा से कहता हूँ महफ़िल से नहीं कहता क्योंकि
ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़,ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़

सहर तक सबका है अंजाम जल कर खाक हो जाना,
भरी महफ़िल में कोई शम्मा या परवाना हो जाए क्योंकि
ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़,  ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़

वहशत-ए-दिल रस्म-ओ-दीदार से रोकी ना गई
किसी खंजर, किसी तलवार से रोकी ना गई
इश्क़ मजनू की वो आवाज़ है जिसके आगे
कोई लैला किसी दीवार से रोकी ना गई, क्योंकि
ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़,ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़

वो हँसके अगर माँगें तो हम जान भी देदें,
हाँ ये जान तो क्या चीज़ है ईमान भी देदें क्योंकि
ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़,  ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़

नाज़-ओ-अंदाज़ से कहते हैं कि जीना होगा,
ज़हर भी देते हैं तो कहते हैं कि पीना होगा
जब मैं पीता हूँ तो कहतें है कि मरता भी नहीं,
जब मैं मरता हूँ तो कहते हैं कि जीना होगा
ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़,ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़

मज़हब-ए-इश्क़ की हर रस्म कड़ी होती है,
हर कदम पर कोई दीवार खड़ी होती है
इश्क़ आज़ाद है, हिंदू ना मुसलमान है इश्क़,
आप ही धमर् है और आप ही ईमान है इश्क़
जिससे आगाह नही शेख-ओ-बरहामन दोनो,
उस हक़ीक़त का गरजता हुआ ऐलान है इश्क़

राह उल्फ़त की कठिन है इसे आसाँ ना समझ
ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़,  ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़

बहुत कठिन है डगर पनघट की
अब क्या भर लाऊँ मै जमुना से मटकी
मै जो चली जल जमुना भरन को
देखो सखी जी मै जो चली जल जमुना भरन को
नंदकिशोर मोहे रोके झाड़ों तो
क्या भर लाऊँ मै जमुना से मटकी
अब लाज राखो मोरे घूँघट पट की

जब जब कृष्ण की बंसी बाजी, निकली राधा सज के
जान अजान का मान भुला के, लोक लाज को तज के
जनक दुलारी बन बन डोली, पहन के प्रेम की माला
दशर्न जल की प्यासी मीरा पी गई विष का प्याला
और फिर अरज करी के
लाज राखो राखो राखो, लाज राखो देखो देखो, 
ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़,ये इश्क़ इश्क़ है इश्क़ इश्क़

अल्लाह रसूल का फ़रमान इश्क़ है
याने हदीस इश्क़ है, कुरआन इश्क़ है
गौतम का और मसीह का अरमान इश्क़ है
ये कायनात जिस्म है और जान इश्क़ है
इश्क़ सरमद, इश्क़ ही मंसूर है
इश्क़ मूसा, इश्क़ कोह-ए-नूर है
ख़ाक़ को बुत, और बुत को देवता करता है इश्क़
इन्तहा ये है के बंदे को ख़ुदा करता है इश्क़

हाँ इश्क़ इश्क़ तेरा इश्क़ इश्क़, तेरा इश्क़ इश्क़, इश्क़ इश्क़ ...

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ऐसा हरगिज़ न होता जो जीने के उसूल होते, एक हाथ से देते तो दुसरे से ज़रूर वसूल होते

लफ़्ज़ों की बौछारों से आँखें भीगने लगती हैं
बिन मौसम गालों को आँखें सींचने लगती हैं
उनकी बात सुनते ही दिल तार-तार होता है
कैसे रोकूँ इसको मैं दिल ज़ार-ज़ार रोता है
जिनकी उम्मीदों पर है ज़िन्दगी भर का सफ़र
क्यूँ वही छोड़ कर जा रहा है बदल कर डगर
इश्क़ का सबक़ भी तो मुझे उसी ने सिखाया
उम्र जिसके नाम लिख दी फ़िर उसी ने रुलाया
ऐसा हरगिज़ न होता जो जीने के उसूल होते
एक हाथ से देते तो दुसरे से ज़रूर वसूल होते
इन्सान को पता है जब अन्जाम आखिरी अपना
क्यूँ वो अपने हांथो बर्बाद कर रहा है मेरा सपना
ख़ता भी कुछ बता देता तो तसल्ली होती मुझे
कम से कम तवज्जोह से तसल्ली होती मुझे

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याद तो आता हूँ ना !


कभी अगर शाम हो और तन्हाई का आलम हो,
सन्नाटे में चीरता हुआ एक एहसास दिल को तेरे,
मेरी याद तो दिलाता होगा तुम्हें 'आरज़ू' |

सुबह सुबह जब खामोशी से नींद खुलती होगी,
फ़िर आँख खुलते ही मुझे नज़दीक न पाना,
मेरी याद तो दिलाता होगा तुम्हें 'आरज़ू' |

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बर्बाद मोहब्बत का मेरा ये कलाम ले लो


आख़िरी बार अब मेरा ये सलाम ले लो
फ़िर न लौटूंगा अब मेरा ये सलाम ले लो

तुम अचानक चले गए ज़िन्दगी से मेरी 
बर्बाद मोहब्बत का मेरा ये कलाम ले लो

वक़्त की गर्दिश में खो गया वो लम्हा
तुम उसी लम्हे का मेरा ये पयाम ले लो

तुम नहीं हो पर लगता है तुम ही तुम हो
शब्-ए-तनहाई का मेरा ये अन्जाम ले लो

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तर्क कर दिया सबने मुझसे रिश्ता, क्यूंकि मेरी जेब में अब पैसा ही नहीं



मिली क्यूँ सज़ा जब ख़ता ही नहीं
मेरा क्या जुर्म है मुझे पता ही नहीं

हक़ पे रहने की सज़ा मिली होगी
बातिल होने की कोई सज़ा ही नहीं

दम घुटने लगा गुलिस्ताँ में क्यूँ
लगता है इसमें अब सबा ही नहीं

तर्क कर दिया सबने मुझसे रिश्ता
क्यूंकि मेरी जेब में अब पैसा ही नहीं

तस्वीर दिखती नहीं है मेरी क्यूँ
मेरे आईने में मेरा चेहरा ही नहीं

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अपनी मुहब्बत की लाश पे खुद गा के आ गया

अपनी मुहब्बत की लाश पे खुद गा के आ गया
क़ातिल को हिफाज़त-ए-सामान दे के आ गया

रौशनी उसके घर पे जगमगाती रही रात भर
ज़िन्दगी के उजालों को अँधेरा बना के आ गया

ता-उम्र उससे मिलता रहा महफ़िल में यूँ ही
और इंतिहा में मैं तन्हाई ले के आ गया

गर्दे-सफ़र की दास्ताँ कुछ यूँ हुई 'सलीम'
अपने ही घर का रास्ता खुद खो के आ गया

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तिजारत-ए-इश्क़ का मसअला उनका यूँ रहा, अपने जिस्म के सौदे का भी मुनीम रखते हैं.



लोग दीवारों की बातों पर यक़ीन रखते हैं
हम तो दिल की बातों पर यक़ीन रखते हैं

लोग रहते हैं यहाँ आशियाँ बना कर के और 
हम सर पे आसमान पैरों पे ज़मीन रखते हैं

तिजारत-ए-इश्क़ का मसअला उनका यूँ रहा
अपने जिस्म के सौदे का भी मुनीम रखते हैं

इलाज-ए-दर्द-ए-दिल का आलम न पूछो
दिल में ही अब हम इसका हक़ीम रखते हैं

सुकूँ-पसंदगी का जूनून ऐसे वाबस्ता है
लो हम अपना नाम ही 'सलीम'* रखते हैं


*सलीम = शान्तिप्रिय

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ज़हर को भी हंस-हंस के पी रहा हूँ दोस्तों !

मैं खुदा का नाम ले कर जी रहा हूँ दोस्तों
ज़हर को भी हंस-हंस के पी रहा हूँ दोस्तों

खूब चाहने का अंजाम अब ये मिला मुझे
ज़िन्दगी रही नहीं फिर भी जी रहा हूँ दोस्तों

बेखुदी में उसकी अंजाम ये हासिल हुआ
ज़ख्म उसके दिए रोज़ सी रहा हूँ दोस्तों

कभी न कभी तो सुन लेगा वो मेरी आह को
अब बस इक इसी आस पे जी रहा हूँ दोस्तों

आँख में अब एक क़तरा भी न बचा 'सलीम'
कैसे कहूँ, बड़ी अज़ीयत से जी रहा हूँ दोस्तों 

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मुझे तमीज़ सिखाओ, मैं इक आशिक़ हूँ !!!!



मेरे नज़दीक न आओ, मैं इक आशिक़ हूँ
मुझे तमीज़ सिखाओ, मैं इक आशिक़ हूँ

सबकी नज़रों से तो अब मैं गिर चुका हूँ
नज़र से तुम भी गिराओ, मैं इक आशिक़ हूँ

लैला-मजनूं ने क्या पाया मुहब्बत करके
मोहब्बत करना है गुनाह, मैं इक आशिक़ हूँ 

इल्तिज़ा है मोहब्बत के दुश्मनों से मेरी
रंज दम भर निभाओ, मैं इक आशिक़ हूँ

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मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए, ख़तरा उठा के भी वो आते मिलने मुझसे !



छत पे रोज़ आ जाते है ख़्वाब मिलने मुझसे
ख़्वाबों में आ जाते हैं जनाब मिलने मुझसे

उनका नाम अब मेरे नाम से वाबस्ता है 
ये सुन क्यूँ लगते हैं लोग जलने मुझसे

मोड़ होता है जवानी का संभलने के लिए
ख़तरा उठा के भी वो आते मिलने मुझसे

ऐ नए दोस्त इतना न कर मुहब्बत मुझसे
डरता हूँ, ग़म फिर न आ जाए मिलने मुझसे

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मैं न हिन्दू न मुसलमान, मुझे जीने दो ! दोस्ती है मेरा ईमान, मुझे जीने दो !!


मैं न हिन्दू न मुसलमान, मुझे जीने दो

दोस्ती है मेरा ईमान, मुझे जीने दो

कोई एहसाँ न करो मुझपे तो एहसान होगा
सिर्फ इतना करो एहसान, मुझे जीने दो

सबके दुःख दर्द को बस अपना समझ के जीना 
बस यही है मेरा अरमान, मुझे जीने दो

लोग होते हैं हैरान मेरे जीने से
लोग होते रहे हैरान, मुझे जीने दो



जगजीत साहब द्वारा गाई गई एक बेहद खूबसुरत नज़्म

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आरज़ू पाने के क़ाबिल न रहा अब कोई, सरपरस्त अपना ही सितमगर क्यूँ है !

सबको मालूम है जब अन्जाम-ए-आखिरी
दूसरों के लिए हर शख्स सितमगर क्यूँ है

आरज़ू पाने के क़ाबिल न रहा अब कोई
सरपरस्त अपना ही सितमगर क्यूँ है

मेहनतकश का अन्जाम भी देखा मैंने 
उसके हरियाली भरे खेत बन्जर क्यूँ है

जिसके लिए हाथों को पत्थरों पर तोड़ा
उसी के हाथों में मेरे लिए पत्थर क्यूँ है

जिसके सहारे चल पड़ा अपने घर को छोड़कर
भटका रहा राह से मुझको मेरा रहबर क्यूँ है

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क्यूँ उसके सामने बेबस हो जाते हैं हम



कैसे करें इज़हारे मुहब्बत उनसे हम
हर वक़्त यही सोचते रहते है हम

मन में उमंग इतनी कि छू लूं आसमाँ
क्यूँ उसके सामने बेबस हो जाते हैं हम

उसकी नज़र-अन्दाज़गी से परेशां रहता हूँ
ऐसे तो मुहब्बत और भड़केगी मेरे सनम
 
उसे मुहब्बत करता हूँ, उसे नहीं है ख़बर
और कुछ नहीं अब बस एक यही है ग़म

वक़्त अभी है कल हो न हो, हम रहे न रहे
इज़हारे मुहब्बत में देर न हो जाये सनम

क्या तुमको कभी ये एहसास नहीं होता
तुम्हारी याद में तिल तिल मर रहे हैं हम

अब आ भी जाओ मेरी ज़िन्दगी बन कर
न तड़पाओ 'आरज़ू' है तुमको मेरी क़सम

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सबक़ ले लो इश्क़ का मुझसे मेरे हबीब, कुछ साल उम्र में तो तुझसे बड़ा हूँ मैं !


समाया है मेरे मन में तुम्हारा ही वजूद
हर वक़्त सोचता हूँ तेरा क्या हूँ मैं?

किस अंदाज़ में लिया होगा तुने मेरा नाम
क्या तू भी सोचती है कि तेरा क्या हूँ मैं?

हर्फे-ग़लत को न तौलो मेरी वफ़ा के साथ
सुन लो सनम, बेवफ़ा नहीं बावफ़ा हूँ मैं

सबक़ ले लो इश्क़ का मुझसे मेरे हबीब
कुछ साल उम्र में तो तुझसे बड़ा हूँ मैं

तड़प की राह अभी तुने पकड़ी ही कहाँ
आगे क़दम बढ़ा ज़रा, आगे खड़ा हूँ मैं

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आज दीदार के लिए आया हूँ आपके, अपने चेहरे से तो ज़ुल्फ़ें हटा लीजिये


या तो जल जाईये या जला दीजिये
अपने आपको मुझसे मिला दीजिये

कब तलक करता रहूँगा इन्तिज़ार
अब तो मोहब्बत का सिला दीजिये

आज दीदार के लिए आया हूँ आपके
अपने चेहरे से तो ज़ुल्फ़ें हटा लीजिये

इस गुलिस्तान में फूल खिल जायेंगे
आप बस एक बार मुस्कुरा दीजिये

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फूल तो देखे बहुत मैंने, फूलों का हार न देख सका.












फूल तो देखे बहुत मैंने
फूलों का हार न देख सका
अपने तो देखे बहुत मैंने
अपनों का प्यार न देख सका

दुनियाँ को देखा बहुत मैंने
घर-संसार न देख सका
दोस्त तो देखे बहुत मैंने
कोई वफ़ादार न देख सका

महफ़िल तो देखी बहुत मैंने
उसका दरबार न देख सका
आशिक़ तो देखे बहुत मैंने 
उस जैसा बीमार न देख सका

भीड़ तो देखी बहुत मैंने 
अपना कोई यार न देख सका
रिश्ते तो देखे बहुत मैंने 
अपना परिवार न देख सका

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लफ़्ज़ों में गुम हो रही हैं शायरियां हमारी



खुशियाँ अब बन गयी हैं बरबादियाँ हमारी
सलाहियत अब बन गयीं है दुश्वारियां हमारी


वक़्त की गर्दिश में हैं अब मुश्ताक्बिल हमारा 
हिम्मत अब बन गयी है लाचारियाँ हमारी

दर-ब-दर भटक रहे हैं मंजिल की तलाश में
क़दमों को अब रोकती हैं परेशानियाँ हमारी

शोलों में मुब्तिला है दुनियाँ का हर बशर
दहशत में अब तब्दील है चिंगारियाँ हमारी

काग़ज़ के आशियाँ से है रिहाईश का वास्ता
खुद अपने घर में हो रही है बरबादियाँ हमारी

माहौल की बर्बादी अब ले जाए कहाँ हमको
मर-मर के जिंदा हो रही है सिसकियाँ हमारी

हर शख्स ने चुन लिया अपना ही रास्ता
सफ़र में गुम हो रही है सवारियाँ हमारी

क़तरों की बिसात कुछ कम नहीं 'सलीम' 
लफ़्ज़ों में गुम हो रही हैं शायरियां हमारी

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दुश्मन को भी अपना दोस्त बनाया है मैंने


दुश्मन को भी अपना दोस्त बनाया है मैंने
अपने हांथों आशियाँ खुद ढहाया है मैंने

नज़रों में अब धुआँ-धुआँ सा रहता है
जब से अपना घर खुद जलाया है मैंने

ग़ैरों की बिसात ही क्या थी मेरे आगे
अपने आप को ही खुद सताया है मैंने

दुनियाँ वालों से तवक्को रखता कैसे
मसीहा हूँ मैं, उनसे खुद बताया है मैंने

जफा जो मिली सबसे तो गिला कैसा
रक़ीब को भी खुद गले से लगया है मैंने

वक़्त को दोष क्या देना अब 'सलीम'
अपने हांथो इसे बुरा खुद बनाया है मैंने

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क्यूँ अब मर्ज़ी, दूसरों के आगे बेजान है मेरी

निदा की सरगोशी और रुख़ से पहचान है मेरी
क्यूँ अब मर्ज़ी, दूसरों के आगे बेजान है मेरी

सब कुछ है अपना मगर अब लगता है 
शख्सियत क्यूँ सबसे अनजान है मेरी

वक़्त जो गुज़र गया उसे याद करना क्या
क्यूँ यादों में अटकी अब भी जान है मेरी

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बिछड़ के भी उलझा रहता हूँ यादों में तुम्हारी, तुम भी दिल के तारों में उलझना न छोड़ देना !



मालूम है दूर हो, तसव्वुर करना न छोड़ देना
ख्वाबों में, मुझे बाँहों में जकड़ना न छोड़ देना

गुलिस्ताँ से आ रही है हसीं खुशबुएँ तुम्हारी
आने वाली इस सबा का रुख न मोड़ देना

पहाड़ों की सरगोशी में मौजूदगी है तुम्हारी
पत्थर से अपने दिल का रिश्ता न तोड़ देना

जिधर भी जाऊं बस नज़र में तुम्हारा है चेहरा
मेरे इस गौर-ओ-फ़िक्र का रस्ता न मोड़ देना

बिछड़ के भी उलझा रहता हूँ यादों में तुम्हारी
तुम भी दिल के तारों में उलझना न छोड़ देना

एक-एक पल सदी सा लगने लगा है अब
इन्तिज़ार के मिठास की शिद्दत न छोड़ देना
  ~ ~ ~
चली तो गयी हो सरहद-ए-सदा से दूर लेकिन
आने से पहले दुनियाँ की रस्मों को तोड़ देना

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ऐसा करो कि अब मुझे एक और भगवान् दो !

परस्तिश की धुन कुछ इस तरह होने लगी है
ऐसा करो कि अब मुझे एक और भगवान् दो

मोहब्बत के बंधन से अब उकता चुका हूँ मैं
इन बंदिशों अब मुझे थोडा सा आराम दो

किराये की ज़िन्दगी है,किश्तों में जी रहा हूँ
जी लूं अपने लिए अब मुझे ये एहसान दो

ग़म की स्याह साजिश में गिरफ़्तार हो चुका हूँ
ऐसा करो कि अब मुझे थोड़ी सी मुस्कान दो

बादल के बनते-बिगड़ते चेहरे सी ज़िन्दगी मेरी
हो जिसमें मेरा अक्स अब मुझे ऐसी पहचान दो

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कभी हँसता हूँ तो कभी रोता हूँ यूँ ही, अजीब ग़फलत में रहता है दिल मेरा !


अल्लाह ही जाने अब क्या होगा मेरा
डरा-सा सहमा-सा रहता है दिल मेरा

कभी हँसता हूँ तो कभी रोता हूँ यूँ ही
अजीब ग़फलत में रहता है दिल मेरा

क़िस्मत का निज़ाम कुछ तरह वाबस्ता है
क़रीब आते ही खो जाता है साहिल मेरा

करने जाता हूँ जब कुछ भी अच्छा
जाने क्यूँ बुरा हो जाता है फ़िर मेरा

निकलता हूँ जाने के लिए जब महलों में 'सलीम'
हो जाता है क्यूँ जल्लाद के क़दमों में सिर मेरा

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अब तुम मेरे चैन में नहीं मेरी आहों में हो, मुझे मालूम है कि तुम ग़ैर की बाँहों में हो !


अब तुम मेरे चैन में नहीं मेरी आहों में हो
मुझे मालूम है कि तुम ग़ैर की बाँहों में हो

जितना हो सके सितम तू मुझपे किये जा
बरबादे-इश्क़ की दहशत मेरे ख्वाबों में हो

पैरों तले ज़मीन और सिर पे रहा न आसमाँ
भूलूँ भी कैसे तुम मेरी हसरतों-सदाओं में हो 

दुआ करता हूँ फ़िर भी हमेशा खुश रहे तू
मैं तेरी जफ़ाओं में, तुम मेरी वफ़ाओं में हो

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तुम चली गयीं तो जैसे रौशनी चली गयी, ज़िन्दा होते हुए भी जैसे ज़िन्दगी चली गयी !


तुम चली गयीं तो जैसे रौशनी चली गयी
ज़िन्दा होते हुए भी जैसे ज़िन्दगी चली गयी

मैं उदास हूँ यहाँ और ग़मज़दा हो तुम वहाँ
ग़मों की तल्खियों में जैसे हर ख़ुशी चली गयी

महफ़िल भी है जवाँ और जाम भी छलक रहे
प्यास अब रही नहीं जैसे तिशनगी चली गयी

दुश्मनान-ए-इश्क़ भी खुश हैं मुझको देखकर
वो समझते है मुझमें अब दीवानगी चली गयी

तुम जो थी मेरे क़रीब तो क्या न था यहाँ 'सलीम'
इश्क़ की गलियों से अब जैसे आवारगी चली गयी

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शाख़-ए-आशियाँ छूट गया, एक 'परिंदा' टूट गया !


शाख़-ए-आशियाँ छूट गया, एक 'परिंदा' टूट गया
अपना कहते-कहते क्यूँ, बीच सफ़र में लूट गया ?

ज़िन्दगी भर साथ निभाने का वादा करके
अब क्यूँ मुझसे वो, पल भर में रूठ गया ?

दुनियाँ भर की सैर कराके मेरा हमसफ़र
मंज़िल से पहले अपने ही शहर में छूट गया !

क़िस्मत क्या ऐसी भी होगी, मालूम न था
साहिल से पहले पतवार समंदर में छूट गया !

दिल तक पहुँचते-पहुँचते महबूब का प्यार
क्यूँ ज़ख्म बन कर जिगर में फ़ूट गया ?

आँखों के तीर ठीक निशाने पर लगाकर 'सलीम'
क्यूँ दिल पर निशाना, एक नज़र में चूक गया ?


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दीपावली की दिली मुबारक़बाद आप सभी ब्लॉगर्स और पाठक बन्धुवों को !
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चेहरे कैसे-कैसे इस दुनिया में, सदियाँ लग जायेंगी ये जानने में !



चेहरे कैसे-कैसे इस दुनिया में, सदियाँ लग जायेंगी ये जानने में
कौन अपना और कौन पराया, सदियाँ लग जायेंगी ये जानने में !

भीड़ बहुत है इस दुनियां में, अपनों की भी कमीं नहीं 
इन्सान इसमें से कौन है, सदियाँ लग जायेंगी ये जानने में !

वो हमें हर सू अपना कहता रहा और जफा भी करता रहा
वो मेरा महबूब है भी या नहीं, सदियाँ लग जायेंगी ये जानने में !

लेकिन फिक्र किस बात की और ग़म किसका अब 'सलीम'
वो मेरा रक़ीब ही है, सदियाँ लग जायेंगी ये जानने में !

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'गर मोहब्बत ना हो तो ना आओ !!



 'गर तुम्हें मुझसे मोहब्बत हो तो सुनो...
मोहब्बत की आग ऐसी भी हो सकती है
कि समाजों की रस्में भी टूट सकती है
तुम इन रस्मों को निभाने के लिए ही आ जाओ !

इश्क़ में कभी ना कभी ऐसे दिन भी आ सकते हैं
कि चाहने वालों की तक़दीरें बदल सकती हैं 
तुम हमारी तक़दीर बदलने के लिए ही आ जाओ !

सन्नाटे में भी एक शोर सुनाई दे सकता है
कि मुझको सिर्फ़ तू ही दिखाई दे सकता है
तुम मेरे इस भरम को रखने के लिए ही आ जाओ !

लाख अँधेरे में भी उम्मीद की लौ जल सकती है
मायूसी की रात में भी चाँदनी नज़र आ सकती है
तुम इन मायूसी को मिटाने के लिए ही आ जाओ !

लेकिन अब तुम जो आना तो सिर्फ़ मेरे लिए ही आओ
मुझ को अपने आगोश में सिर्फ़ लेने के लिए ही आओ !

सिर्फ़ दुनिया को दिखाने के लिए ना आओ
सिर्फ़ मुझपर एहसान जताने लिए ना आओ !
'गर मुझसे मोहब्बत ना हो तो ना आओ
सिर्फ़ अपनी रस्म निभाने के लिए ना आओ !

'गर तुम्हें मोहब्बत ना हो तो ना आओ !!

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मोहब्बत की राह पर चलते-चलते, अब वो ऐसा क्यूँ कहती है कि मैं उसकी आरज़ू ना करूँ !












मोहब्बत की राह पर चलते-चलते 
अब वो ऐसा क्यूँ कहती है
कि मैं उसकी आरज़ू ना करूँ !

साथ जीने मरने की क़समें ख़ा कर
अब वो ऐसा क्यूँ कहती है
कि मैं उसकी जुस्तजू ना करूँ !

आह ! मैं ही समझ ना सका कि
उसके घर तो बारात आई थी
और धूम से बजी शहनाई थी
शायेद इसीलिए कहती है
कि मैं उसकी आरज़ू ना करूँ !

उसने निभाया समाजों का धरम
उसने रखा बाबुल का भरम
शायेद इसीलिए कहती है
कि मैं उसकी जुस्तजू ना करूँ !

कहती है कि उसके ख़्याल में ना खोऊं
और उसे याद करके अब ना रोऊं
उसे अब भी मेरे हालात की चिंता है
शायेद इसीलिए कहती है
कि मैं उससे अब गुफ्तगू ना करूँ !

लेकिन कैसे मैं उसके ख़्यालों में ना खोऊं
और कैसे उसे याद करके ना रोऊं
कैसे मैं उसकी आरज़ू ना करूँ
कैसे मैं उसकी जुस्तजू ना करूँ ?

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ज़िन्दगी की आरजू........!

बार आरज़ू ने ज़िन्दगी से पूछा कि मैं कब पूरी होउंगी?
ज़िन्दगी ने जवाब दिया- 'कभी नहीं'।

आरज़ू ने घबरा कर फ़िर पूछा- 'क्यूँ?'

तो ज़िन्दगी ने जवाब दिया 'अगर तू ही पूरी हो गई तो इंसान जीएगा कैसे?!'

ये सुन कर आरज़ू बहुत मायूस हो गई और अपने आँचल के अन्दर मुहं छुपाकर सुबक सुबक कर रोने लगी

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अब फ़िर आ गए हो तो अब ना जाना !














अब फ़िर आ गए हो तो अब ना जाना !

ज़िन्दगी खुशनुमा ना थी
आरज़ूयें ज़िंदा ना थीं
अब वक़्त ऐसा जो लाये हो कि
ज़िन्दगी खुशनुमा है
आरज़ूयें ज़िन्दा हो गयीं हैं !
इसलिए
अब फ़िर आ गए हो तो अब ना जाना !

वक़्त का एक लम्हा सदियों की तरह लगता था
तनहाई में भी लगता जैसे कोई मुझे तकता था
अब वक़्त ऐसा लाये हो कि
वक़्त रुकता ही नहीं पल भर टिक कर
सन्नाटें में भी तुम्हारे एहसास का साया रहता है !
इसलिए
अब फ़िर आ गए हो तो अब ना जाना !

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तमन्ना जीने की फ़िर से जाग उठी मेरे दिल में, यूँ मरने की हसरत फ़िर से जाग उठी मेरे दिल में !


तमन्ना जीने की फ़िर से जाग उठी मेरे दिल में
यूँ मरने की हसरत फ़िर से जाग उठी मेरे दिल में

उमंग उड़ने की फ़िर से जाग उठी मेरे दिल में
तरंग मचलने की फ़िर से जाग उठी मेरे दिल में 

धड़कन उसी तरह उछल उठी बल्लियों ऊपर
थी जैसे बरसों पहले वो मचल उठी मेरे दिल में

खुश हुआ मैं एक अच्छे मुस्तक़बिल की आस में
है फ़िर क्यूँ वो एक लहर-सी उठी मेरे दिल में?


प्यार पाने के लिए मैंने क्या-क्या न किया 'सलीम'
आरज़ूयें किश्तों में फ़िर से जाग उठी मेरे दिल में

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याद है मुझे आग के साथ खेलने के वो दिन आज भी अब तो हवा ही एक झोंके में मुझे रोज़ जला देती है


ख़्वाबों में आपकी आमद की ललक मुझे रोज़ सुला देती है
आँखों में आपकी यादों की कसक मुझे रोज़ रुला देती है

याद है मुझे आग के साथ खेलने के वो दिन आज भी
अब तो हवा ही एक झोंके में मुझे रोज़ जला देती है

मज़बूत इतना था जब पत्थर भी फ़ना थे मेरे आगे
अब तो ज़ख्म की एक सिहरन ही मुझे रोज़ हिला देती है

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गर वो चाहे तो खुल जाए ज़ुल्फों की सारी लटें, आईना ऐसा लगा जो अन्दर नहीं खुलने देता !


ख़्वाहिश है अपनी पस्ती से निजात पा जाऊं
कौन डर मुझमें है जो दर-ए-नसीब नहीं खुलने देता


हथेलियों में है लकीरें ऐसी जो जज़ीरों से हो भरी
कौन हाथों से जंज़ीर-ए-जजीरा नहीं खुलने देता


'गर वो चाहे तो खुल जाए ज़ुल्फों की सारी लटें  
आईना ऐसा लगा जो अन्दर नहीं खुलने देता 


उसकी शख्सियत है गुमनाम सी शहर भर में
अपना भेद वो किसी पर नहीं खुलने देता 


खुला पड़ा है आसमान मंज़िल-ए-सफ़र के लिए 
कौन है जो रास्ता बाहर नहीं खुलने देता 


ज़ेहन-ओ-जिस्म में आग का दरिया है भरा
पर एक चिंगारी वह दिल में नहीं जलने देता

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धुप है तेज़, कहीं ज़रा सी छाँव नहीं, बादलों को अब कहाँ से लाऊँ मैं !


किस जतन से आपके और क़रीब आऊं मैं 
केवल आपको ही अपना बनाऊं मैं !

पास हो कर भी हम दूर हैं इतने 
किस सदा से आपको बुलाऊं मैं !

शाम-सुबह बे-क़रार रहता हूँ 
कहाँ चन्द लम्हे का चैन पाऊँ मैं !

धुप है तेज़, कहीं ज़रा सी छाँव नहीं 
बादलों को अब कहाँ से लाऊँ मैं !

एक पल भी याद से आपकी ग़ाफिल नहीं
अब ख़ूब कहते हैं, भूल जाऊं मैं !!

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