दिखता नहीं है कुछ भी यहाँ, कोई क्या करे: Saleem KHAN


दिखता नहीं है कुछ भी यहाँ, कोई क्या करे
होता नहीं है कुछ भी यहाँ, कोई क्या करे.
टूटा जो सुनहरा सपना, कोई क्या करे
दूर हो गया अपना, कोई क्या करे.

जीस्त सूनी-सूनी थी हर सू जब
दिल में आया नहीं था कोई भी तब
आया वो दुनियाँ में मेरे खुशियाँ लेके
क्यूँ छोड़ गया मुझे तन्हा, कोई क्या करे.

वादे पे वादे किये थे उसने मगर
दिल में इरादे किये थे उसने मगर
क़समें भी खाईं साथ रहने की उम्र भर
क़समें तोड़ के गया चला, कोई क्या करे.

3 टिप्पणियाँ:

kshama ने कहा…

वादे पे वादे किये थे उसने मगर
दिल में इरादे किये थे उसने मगर
क़समें भी खाईं साथ रहने की उम्र भर
क़समें तोड़ के गया चला, कोई क्या करे.
Sach! Aise me koyi kya kare....!

वन्दना ने कहा…

बहुत खूबसूरत अहसास

shama ने कहा…

वादे पे वादे किये थे उसने मगर
दिल में इरादे किये थे उसने मगर
क़समें भी खाईं साथ रहने की उम्र भर
क़समें तोड़ के गया चला, कोई क्या करे.
Wah! Kya likha hai!

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