..........................जो तुम ना थे मेरे सनम


जो तुम ना थे मेरे सनम
तो क्या थी ये ज़िन्दगी
कुछ भी नहीं

जो तुम नहीं हो, मेरे सनम
तो क्या है ये ज़िन्दगी 
कुछ भी नहीं

बंदगी की हद से ज़्यादा तेरा सुरूर था 
कैसे बताऊँ मैं तुझको तू मेरा गुरुर था
 
शाम से सुबह तक बस तेरी तलाश है  
तेरे बिना ज़िन्दगी मेरी जिंदा लाश है
 
तू नही तो ज़िन्दगी कैसी उदास है 
बुझती नही है ये भी कैसी प्यास है  

अक़्स-ऐ- आरज़ू लिए फिरते रहेंगे हम
पल-पल तेरी याद में मरते रहेंगे हम

मरासिम मुस्तकिल न सही, मिजाजे-आशिक़ी रहे
नगमा नहीं साज़ नही न सही तेरी मौसिक़ि रहे


जो तुम ना थे मेरे सनम
तो क्या थी ये ज़िन्दगी
कुछ भी नहीं

जो तुम नहीं हो, मेरे सनम
तो क्या है ये ज़िन्दगी 
कुछ भी नहीं

2 टिप्पणियाँ:

........................................काश !



काश !
अगर आप मेरी ज़िन्दगी में ही न आती,
तो आपको खोने की नौबत ही न आती |

अगर आप मेरी खुशियाँ ही न बनतीं,
तो आपके ग़म की नौबत ही न आती |

अगर आपको देखकर ज़िन्दगानी न आती,
तो बे-मौत मरने की नौबत ही न आती |

अगर आरज़ू-ऐ-इश्क दिल में ही न उठती,
ख़स्ता-ख़स्ता बिखरने की नौबत ही न आती |

अगर दिल में उल्फ़त की रवानी न होती,
आपको बेवफ़ा कहने की नौबत ही न आती |

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उम्मीद ही ज़िन्दगी है !


"निराशा (नाउम्मीदी) मौत के बराबर है, आशा (उम्मीद) जीवन (ज़िन्दगी) है बल्कि उम्मीद ही ज़िन्दगी है जहाँ ज़िन्दगी है वहां उम्मीद है जहाँ उम्मीद नही वहां ज़िन्दगी भी नहीं इसलिए हमेशा अपने मन में उम्मीद की लौ जलाकर रखना चाहिए "

एक बार एक सहाबी* के पास एक इन्सान आया वह बहुत ग़मगीन था, निराश था उसने सहाबी से कहा- वह मरना चाहता है, और खुद्कुशी कर लेगा इस ज़िन्दगी से वह नाउम्मीद हो गया है उसने अपनी बात कही और रो पड़ा उसका सोचना था की उसे वो रोकेंगे या उसको किसी समस्या का समाधान करने को उद्धत करेंगे, मगर उसे सहाबी की बात सुनकर झटका लगा

उसकी स्थिति देख कर सहाबी ने कहा- "तुम्हारा मर जाना ही बेहतर है, जो लोग निराशा (नाउम्मीदी) में जीया करते हैं, उनका जीवन मौत से भी बदतर है "

सहाबी की बात से वह दुखी हो गया, कहाँ तो वह सांत्वना की बात सुनने आया था कहाँ सहाबी ने उसे फटकारना शुरू कर दिया उन्होंने कहा- "आशावाद ही निर्माता है आशावाद ही किसी इन्सान का ज़हनी (मानसिक) सूर्योदय है इससे ज़िन्दगी बनती है यानि जीवन का निर्माण होता है, आशावाद से तमाम मानसिक योग्यताओं का जन्म होता है, आशावादी मनुष्य का जीवन ही सार्थक होता है अगर तुम आशावादी नहीं बन सकते हो, तो तुम्हारी ज़िन्दगी बेकार है, खुद्कुशी कर लो और इंसानियत का कलंक न बनो "

सहाबी का यह कथन एक कटु सत्य है क्या आप इनसे सहमत नहीं ?

"निराशा (नाउम्मीदी) मौत के बराबर है आशा (उम्मीद) जीवन (ज़िन्दगी) है बल्कि उम्मीद ही ज़िन्दगी है जहाँ ज़िन्दगी है वहां उम्मीद है जहाँ उम्मीद नही वहां ज़िन्दगी भी नहीं इसलिए हमेशा अपने मन में उम्मीद की लौ जलाकर रखना चाहिए "
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मेरा अंतर्मन मुझसे कहता है कि मैं इस क़ायनात की सबसे ज़हीन मखलूक इन्सान की बिरादरी से हूँ, मुझे ईश्वर/अल्लाह ने ज़िन्दगी बक्शी, ज़िन्दगी में तमाम नेमतें दीं, दुनियाँ में मेरा जन्म कीडों मकोडों की तरह रेंगने के लिए नहीं हुआ, मेरा जन्म गरीबी के नरक में सड़ने के लिए नहीं हुआ है मुझे ईश्वर/अल्लाह ने बनाया है किसी न किसी मक़सद के लिए, न कि यूँ ही मेरा इस दुनियाँ में पैदा होना किसी न किसी महान काम के लिए हुआ है मेरे लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं है अपनी ज़िन्दगी में अपनी आरज़ू पूरी करने के लिए हर सम्भव प्रयास करना चाहिए क़ामयाबी ज़रूर मिलेगी|
(*सहाबी, वो हैं जिन्होंने हुज़ुरे अक़दस हज़रत मोहम्मद सल्ल० का साथ उनकी रहती ज़िन्दगी में हर मोड़ पर दिया था, जैसे हज़रत अबू बकर सिद्दीक रज़ि०, हज़रत उस्मान रज़ि०, हज़रत उमर रज़ि०, हज़रत अली रज़ि० वगैरह...)

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जीवन की ये अभिलाषा


जीवन की ये अभिलाषा
कभी न पूरी होने वाली आशा,
सागर, नदिया जीवन सारा
प्यास न बुझने की ये निराशा

जीवन की ये अभिलाषा
पूरी करने को अनवरत दौड़ रहा,
ख़त्म हो गया जीवन सारा
कुछ न पाने की ये निराशा

जीवन की ये अभिलाषा
कभी न पूरी होने वाली आशा,
न रहती अधूरी, गर हो जाती पूरी
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इस आखिरी पंक्ति में मुझे समझ नही आ रहा क्या लिखूं?!!!

इतना मालूम है कि लिखी जाने वाली इस अधूरी पंक्ति में जो होगा उसका भावार्थ इस प्रकार होगा कि-

"अगर जीवन की सभी अभिलाषा पूरी हो जाएगी, सभी आशा पूरी हो जायेगी तो क्या मनुष्य जी पायेगा? क्या उसके पास अपनी सभी अभिलाषा और आशा पूरी हो जाने पर कोई अभिलाषा न बचेगी? अर्थात जीवन की सभी अभिलाषा पूरी हो जाने पर मनुष्य जी ही नहीं सकता, वह तो मृत समान है "

कृपया इन भावार्थ को एक लाइन में समेट कर बनाईये

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आरज़ू

मेरी बातों का ज़रा सा भी लगे बुरा तुम्हे 'आरज़ू'
कुछ न कहूँगा पर मुझे इस तरह सताया ना करो

हमें पता है कि मिलन की बेला अब ना आएगी
कम-अज़-कम मेरे ख्वाबों से तो जाया ना करो

याद-ओ- ख़्वाब ही बचे है मेरे ज़ेहन-ओ-तसव्वुर में
याद-ओ-ख़्वाब से तुम 'प्लीज़' मेरे जाया ना करो

लोग ज़ालिम है, समझ लेंगे निगाहों की हलचल
आँखों में अपने कभी मेरे लिए आंसू लाया ना करो

कोई जानेगा नहीं और कोई समझेगा भी नहीं
अपने दिल का हाल किसी को भी बताया ना करो

ज़ख्मे दिल पर कोई मरहम ना लगायेगा 'आरज़ू'
रकीब क्या हबीब को भी ज़ख्मे दिल दिखाया ना करो

मैंने हाल ही में "मेरा अस्तित्व" ब्लॉग पर लिखी एक रचना पर यह टिप्पडी करी थी, वो रचना है,



हमारे ग़मों से घबराया ना करो,
हमारे आंसुओं पे आंसू बहाया ना करो ,
"भाव" के लूटेरों ने, खूब लूटा है हमें,
ऐसे में, फ़िर मिलने की आस बंधाया ना करो ।



सच बात तो ये है कि मुझे यह ब्लॉग "ज़िन्दगी की आरज़ू" बनाने का ख़याल "मेरा अस्तित्व" ब्लॉग को देखने और पढ़ने के बाद आया और मेरे लफ्ज़ और शाएरी इसी ब्लॉग की टिप्पडीयों से निकले, वैसे तो मैं जब हाई स्कूल में था तभी से शेर ओ शाएरी, ग़ज़लों और किस्से कहानियो का बहुत शौक़ था मगर शहर में आकर सब कुछ जैसे ख़तम सा हो गया था मगर अब इसे प्रेरणा कहें या पुराना शौक़ दुबारा जाग गया, जो भी है........आपके सामने है।

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वो प्यार था ही नहीं !

इन्सान किसी से मुहब्बत करता है,
अपनी आरज़ू का इज़हार भी करता है,
उस इज़हार का इक़रार भी होता है,
वक़्त के परों पर मुहब्बत जवान होती है......
मगर ये क्या......

मुहब्बत का जब परवान होना चाहिए, उरूज़ होना चाहिए,
उस वक़्त वो आपका साथ छोड़ देता है......तनहा और अकेला

मुझे यह बात बाद में समझ आई ....... कि

"मोहब्बत का एक उसूल होता है, आपसे प्यार करने वाला चाहे कितनी दूर क्यूँ न हो, उससे मिलने की परिस्थितियां कितनी भी नकारात्मक क्यूँ न हो भले ही आप उसे खुला छोड़ दें...अगर आपसे उसका प्यार सच्चा, वाकई सच्चा होगा तो वह ज़रूर वापस आएगा और अगर नहीं आया तो समझ लीजिये कि उसने आपसे कभी प्यार किया ही नहीं.............."

वाक़ई !!!?

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याद तो आता हूँ ना !

कभी अगर शाम हो और तन्हाई का आलम हो,
सन्नाटे में चीरता हुआ एक एहसास दिल को तेरे,
मेरी याद तो दिलाता होगा तुम्हें 'आरज़ू' |

सुबह सुबह जब खामोशी से नींद खुलती होगी,
फ़िर आँख खुलते ही मुझे नज़दीक न पाना,
मेरी याद तो दिलाता होगा तुम्हें 'आरज़ू' |

11 टिप्पणियाँ:

बेबस हैं...

दिन-- रात के सामने।
खुशी-- ग़म के सामने।
ग़म-- खुशी के सामने।
कल-- आज के सामने।
आंख--आंसू के सामने।
दिल--दिमाग के सामने।
इन्सान--कुदरत के सामने।
नफरत-- मुहब्बत के सामने।
जाहिल-- आलिम के सामने।
और
ज़िन्दगी-- आरज़ू के सामने।

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कहाँ तलाशूँ तुझे

दू तलक गूंजते हैं यहाँ सन्नाटे रात भर,
दिन के शोर ओ शराबे में भी होता हूँ मैं तन्हाँ.
दिल की आवाज़ भी सुन लो, सुन लो मेरी आरज़ू,
कहाँ तलाशूँ तुझे मैं, तुम हो कहाँ, मैं हूँ कहाँ?

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ज़िन्दगी और आरजू

बार आरज़ू ने ज़िन्दगी से पूछा कि मैं कब पूरी होउंगी?
ज़िन्दगी ने जवाब दिया- 'कभी नहीं'।

आरज़ू ने घबरा कर फ़िर पूछा- 'क्यूँ?'

तो ज़िन्दगी ने जवाब दिया 'अगर तू ही पूरी हो गई तो इंसान जीएगा कैसे?!'

ये सुन कर आरज़ू बहुत मायूस हो गई

और

अपने आँचल के अन्दर सुबक सुबक कर रोने लगी।

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