देखें क्या बचा अब हुस्न यार में




दर्द उसने दिया मुझे फ़स्ल-ए-बहार में
चैन उसने ले लिया मेरे एक क़रार में

मेरे दम से अब तो ये क़ायनात है
शब्-ओ-माहताब हैं अख्तियार में

जुदाई का मज़ा भी क्या अजीब है
ऐसा मज़ा कहाँ विसाल-ए-यार में

आओ एक बार और आ जाओ
देखें क्या बचा अब हुस्न यार में

जीस्त की स्याह मेरी दास्तान में 
कुछ नहीं बचा दिल-ए-दाग़दार में

कैसे गया उलझ 'सलीम' प्यार में
हाथ काँटों में और पाँव अँगार में

1 टिप्पणियाँ:

judayi ka maja sach mein ajeeb hai... dard bhi hota hai aur us dard mein jeene ka maja bhi aata hai... jise hum tavajjo nahi dete apni jindagi mein uske juda hone ke baad ahsaas hota hai uski ahmiyat aur use paane kee chhatpataahat... ajeeb ahsaas hai...

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