कोई आरज़ू नहीं और ज़िन्दगी में...(No desire in life now) presented by Saleem Khan


तन्हा मैं ज़िन्दगी बिताऊं कैसे
तेरी याद दिल से मिटा दूँ कैसे


कोई आरज़ू नहीं और ज़िन्दगी में
सिर्फ़ यही की तुझे अपना बनाऊं कैसे


तू नहीं हो सकती मेरी ये मैं जानता हूँ
पर दिल-ऐ-नादाँ को ये समझाऊं कैसे


ज़ख्म दे रहे हैं मेरे दिल के तुझे दुआ
तुझे ख़ुशी मिले और मैं न मुस्कुराऊं कैसे


ख़त्म न हो इस दिल की कहानी क़यामत तक
पर तू न हुई मेरी ये मैं सबको बताऊँ कैसे


रह गया प्यासा मैं तेरी मोहब्बत का
इस दिल की प्यास बढ़ गयी है बुझाऊं कैसे


ज़िन्दगी दी खुदा ने और दे दी तेरी आरज़ू
अब इस आरज़ू को मैं दिल से मिटाऊं कैसे


ज़िन्दगी मिली है तो मोहब्बत ही कर लूं
बिन तेरी मोहब्बत के दुनियाँ से चला जाऊँ कैसे


इंतज़ार करूँगा तेर इक़रार का उस जहाँ में भी
मर कर तू ही बता तुझे भूल जाऊं कैसे

9 टिप्पणियाँ:

Khursheed ने कहा…

आपका एक रंग यह भी है, सोचा न था. पहली बार आया हूँ इस ब्लॉग पर. क्या बात है! ग्रेट. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति.

Alim Azmi ने कहा…

बहुत खुबसूरत. आपको फ़ोन किया था आपने अटेंड नहीं किया. प्लीज़ कॉल में

फ़ैसल राशिद ने कहा…

श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम

Ragini ने कहा…

ज़िन्दगी दी खुदा ने और दे दी तेरी आरज़ू
अब इस आरज़ू को मैं दिल से मिटाऊं कैसे

sundar bhaav

शुक्रिया हौसला अफज़ाई का

स्वप्न ने कहा…

sundar aur maarmik

आमीन ने कहा…

ज़ख्म दे रहे हैं मेरे दिल के तुझे दुआ
तुझे ख़ुशी मिले और मैं न मुस्कुराऊं कैसे....

बहुत सुन्दर...

श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम...

शुक्रिया....

वन्दना ने कहा…

kya kahun..........har sher ne dil moh liya............seedhe dil mein utar gaye.
ज़ख्म दे रहे हैं मेरे दिल के तुझे दुआ
तुझे ख़ुशी मिले और मैं न मुस्कुराऊं कैसे

kis kis sher ki tarif karun..........agar ho sake to ye sare sher mujhe mail kar dein.

behtreen .........lajawaab

Kulwant Happy ने कहा…

श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम...

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