तर्क कर दिया सबने मुझसे रिश्ता, क्यूंकि मेरी जेब में अब पैसा ही नहीं



मिली क्यूँ सज़ा जब ख़ता ही नहीं
मेरा क्या जुर्म है मुझे पता ही नहीं

हक़ पे रहने की सज़ा मिली होगी
बातिल होने की कोई सज़ा ही नहीं

दम घुटने लगा गुलिस्ताँ में क्यूँ
लगता है इसमें अब सबा ही नहीं

तर्क कर दिया सबने मुझसे रिश्ता
क्यूंकि मेरी जेब में अब पैसा ही नहीं

तस्वीर दिखती नहीं है मेरी क्यूँ
मेरे आईने में मेरा चेहरा ही नहीं

2 टिप्पणियाँ:

वन्दना ने कहा…

तस्वीर दिखती नहीं है मेरी क्यूँ
मेरे आईने में मेरा चेहरा ही नहीं

यही तो दुख है और यही आज का सच है …………आईने मे "मै" ही नही मिलता।

Dr. Ayaz Ahmad ने कहा…

अच्छी पोस्ट

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