
दिन के शोर ओ शराबे में भी होता हूँ मैं तन्हाँ!
कहाँ तलाशूँ तुझे मैं, तुम हो कहाँ, मैं हूँ कहाँ?
मैंने हाल ही में "मेरा अस्तित्व" ब्लॉग पर लिखी एक रचना पर यह टिप्पडी करी थी, वो रचना है,
हमारे ग़मों से घबराया ना करो,
हमारे आंसुओं पे आंसू बहाया ना करो ,
"भाव" के लूटेरों ने, खूब लूटा है हमें,
ऐसे में, फ़िर मिलने की आस बंधाया ना करो ।
सच बात तो ये है कि मुझे यह ब्लॉग "ज़िन्दगी की आरज़ू" बनाने का ख़याल "मेरा अस्तित्व" ब्लॉग को देखने और पढ़ने के बाद आया और मेरे लफ्ज़ और शाएरी इसी ब्लॉग की टिप्पडीयों से निकले, वैसे तो मैं जब हाई स्कूल में था तभी से शेर ओ शाएरी, ग़ज़लों और किस्से कहानियो का बहुत शौक़ था मगर शहर में आकर सब कुछ जैसे ख़तम सा हो गया था मगर अब इसे प्रेरणा कहें या पुराना शौक़ दुबारा जाग गया, जो भी है........आपके सामने है।
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